राजा भोज के अपमान संबंधी ज्ञापनो में शासन की अनदेखी


मुलतापी समाचार

राजा भोज की प्रतिमा पर गंदा पानी जूठन फेकी पास के मटन रेसटोरेंट्स वालों ने

बैतूल। जिला क्षत्रिय पवार समाज संगठन बैतूल व विश्व हिन्दू परिषद् बजरंग दल द्वारा राजा भोज के अपमान संबंधी ज्ञापनो की शासन द्वारा अनदेखी
विश्व हिन्दू परिषद् बजरंग दल एवं जिला क्षत्रिय युवा पवार समाज संगठन बैतूल द्वारा दिनांक 25/02/2020 तथा जिला क्षत्रिय पवार समाज संगठन बैतूल द्वारा दिनांक 26/02/2020 को राजा भोज की अभिनन्दन सरोवर बैतूल स्थित प्रतिमा पर मांस के जूठन फेके जाने तथा महापुरुष राजा भोज के अपमान करने सम्बन्धी ज्ञापन कलेक्टर महोदय जी को दिए गए थे साथ ही प्रतिमा के समीप स्थित बिरियानी मांसाहार की दूकान को विस्थापित करने की मांग की गई थी जिसके सम्बन्ध में अपर कलेक्टर अदिति यादव जी द्वारा उचित कार्यवाही करने का आश्वाशन दिया गया था, लगभग दो सप्ताह बित जाने के बाद भी आज तक उक्त विषय में प्रशासन द्वारा इस प्रकार के संवेदनशील मामले में कोई उचित कार्यवाही नहीं की गई है, महापुरुषों के अपमान के कारण समस्त हिन्दू समाज एवं पवार समाज के लोगो की भावनाओ को ठेस पहुच रही है इस प्रकार से महापुरुषों के अपमान से सम्बंधित मामलों में प्रशासन की अनदेखी असहनीय होते जा रही है, यदि जल्द से जल्द मांसाहार बिरियानी की दूकान को अभिनन्दन सरोवर के पास से विस्थापित नहीं किया जाता है तो समस्त हिन्दू समाज एवं पवार समाज के द्वारा बड़े स्तर पर आन्दोलन करने की बात सामने आ रही है |

रानी पद्मावती और चित्तौड़गढ़ का इतिहास


ईसवी सन 1303 में रानी पद्मावती ना मिल पाने व उसकी मृत्यु से अलाउद्दीन खिलजी पागल सा हो गया था। वह अपने को छला हुआ महसूस करने लगा था। पूरे 8 माह युद्ध के बाद भी वह पद्मावती को ना पा सका। किंतु अब चितौड़ उसके अधीन था।

रानीपद्मावती की जौहर अग्नि ।
खिलजी को कर गयी छलनी ।।

इसके पश्चात मध्य व दक्षिण भारत में विजय के लिए उसने अपने सेनापति मुल्तानी को भेजा। सन 1305 ईसवी में मालवा पर अधिकार करने के लिए खिलजी की सेना आगे बढ़ी। उस समय मालवा पर पंवार राजा महलक देव का राज था। जैसे ही खबर मिली कि खिलजी की विशाल सेना मालवा पर अधिकार करने आ रही है, राजा महलक देव ने तुरंत सेना तैयार की और युद्ध के लिए रवाना हो गए। उन्होंने खिलजी की सेना को रतलाम के पास ही रोक लिया। दोनो सेनाओं में युद्ध होने लगा। राजा महलक देव के नेतृत्व में पंवार सैनिक कुशलता से लड़ रहे थे। पंवारो से युद्ध मे खिलजी की सेना के होश उड़ गए। उस युद्ध मे अब तक 700 मुस्लिम सैनिक मारे जा चुके थे तो वही पंवारो के 500 सैनिक। खिलजी के सेनापति ने अपने सैनिको को हिम्मत हारते देख तुरंत सैनिक सहायता की मांग की खिलजी ने तुरंत सैनिक भेज दिये और साथ ही अच्छे हथियार भी पहुचाये गये।और सैनिक टुकड़ी आते देख पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। राजा महलक देव ने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। क्योंकि ख़िलजी के सैनिक संख्या में ज्यादा थे साथ ही उनके पास अन्य सैनिको द्वारा अच्छे हथियार लायें गये थे। बचे हुए सैनिक और राजा महलक देव पीछे लौटते हुये मांडू आ गये। उस युद्ध मे मरे हुये सैनिको के साथ 12 बाई सती हो गई थी।राजा महलक देव के पीछे हटने के बाद भी खिलजी की सेना ने उनका पीछा किया और मांडू तक आ गये। वहाँ भी युद्ध होने लगा। सेनापति मुल्तानी ने राजा महलक देव को मार दिया। राजा महलक देव की मृत्यु से पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। मांडू को घेर लिया गया। सभी पवाँर सैनिक वहाँ से भागने लगे। इस हार से पंवारो ने अपनी आन बान और संस्कृति बचाये रखने के लिए मालवा क्षेत्र से पलायन का विचार किया। कुछ पंवार धार के आस पास के गांव में बस गए। पंवारो ने राजा महलक देव के पुत्र संजीव कुमार को धारा नगरी का नया राजा घोषित किया गया। ( इतिहास में वर्णित आधार पर)

रतलाम युद्ध मे हार के बाद पवाँर सैनिक अपने साथ जरूरत के सामान ले अपने-अपने परिजनों के साथ वहाँ से पलायन कर नर्बदा किनारे वर्तमान पवारखेड़ा( होशंगाबाद) तक आये और वहाँ से नर्बदा जी को पार कर पहला पड़ाव डाला। जिसमें 72 कुल के लोगो ने पलायन किया था।। युद्ध से थके हारे सैनिक और उचित खान पान की व्यवस्था ना हो पाने के कारण बच्चे, बूढे और महिलाएं बीमार होने लगीं। तभी कुछ बुजुर्गों ने इस बीमारी को देवी का प्रकोप समझ पूजा भंडारा की सलाह दी। सभी पंवारो ने मिल कर चंदा जमा किया जिससे 1200 रुपये जमा हुए। इन पैसों से विशाल भंडारा व देवी पूजा की गई। जिसमें आस पास के बहुत से लोग शामिल हुए थे।(भाट से मिली जानकारी पर) पंवारो ने जहाँ पहला पड़ाव डाला था वह स्थान पवारखेड़ा नाम से जाना जाने लगा। अपने मूल स्थान से नये वातावरण में भटके शाकाहारी धार्मिक पवाँर जाती दिनों दिन दुर्बल होती जा रही थी। उन्होंने वहाँ से सतपुडा के जंगलों में आगे बढ़ते हुए दूसरा पड़ाव वर्तमान धार गांव में डाला। कहाँ वह राजसी ठाठ बाट और कहाँ यह वनवासी जीवन पवाँर जाति की हालत में अब भी कोई ज्यादा सुधार नही हुआ था। रतलाम युद्ध मे घायल कुछ लोग मर चुके थे जिसके कारण स्थति दयनीय थी। जंगलों में रहने वाले गोंड जाति के लोग दुबले पतले पंवार को देख उन पर हँसते औऱ मांस मदिरा सेवन की बात बताते। उस समय गोंड जाति जंगलों में शिकार व महुआ की दारू का सेवन करती थी। जंगल के वातावरण में यह भोजन उनके अनुकूल भी था। इन जंगलों में शाकाहारी जीवन शरीर के लिए अनुकूल ना होने के कारण कुछ बुजुर्गों ने मांस व मदिरा का भक्षण उचित समझा।

उस समय वहाँ के गोंड राजा नरसिंह राय प्रथम थे। उन्हें खबर मिली कि कुछ राजपूत सैनिक युद्ध में हारकर उनके राज्य में आये हैं तो वे उनसे मिलने आये उनकी दुर्बलता को देख उन्होंने भी मांस खाने की सलाह दी। पवाँर लोगो ने धार गांव के समीप ही जनेऊ को निकाल कमर में बांध लिया तो कुछ लोग जनेऊ को नर्मदा जी मे प्रवाहित कर आये।राजा नरसिंह राय राजपूत लोगो की शक्ति से भली भांति परिचित थे। उन्होंने पंवारो को अपनी राजधानी बुलाया और सभी की अच्छी आवभगत करी। और वही बस जाने को कहाँ। वह क्षेत्र बदनूर (वर्तमान बैतूल ) के पास था। गोंड राजा ने उन्हें महाजन करके संबोधित किया और गाँव बसाने के लिए जमीन दान दी। वर्तमान में बैतूल के पास रोंढा , भडूच, बैतूल बाजार , खेड़ी, गाँव मे आज भी पवाँर अपने महाजनी ठाठ बाट से रहते हैं। और अपने को महाजन बताते हैं। गोंड राजा से मित्रता के बाद पंवारो ने उनकी मदद का आश्वासन दिया। खेड़ला किला का निर्माण राजा नरसिंह राय ने 14 वी सदी में किया था। जिसमे पवाँर जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान में यह किला खंडहर का रूप के चुका है। यहाँ खजाने की खोज में कई बार खुदाई की गई है। खुदाई से पता चला है कि वहाँ सूर्य मंदिर भी था। सूर्य मंदिर पंवारो के अग्नि उपासक होने के प्रमाण है। भले ही राज्य छूट गया पंरतु वे अपनी सांकृतिक विरासत को कभी नही भूले। अपनी बोली, पहनावा, रीति रिवाज नही भूले ।

बैतूल से आगे बढ़ते हुये पवाँर समाज ताप्ती उदगम मुलताई तक पहुँच गये। वहाँ उन्होंने कई गांव बसाए जैसे चन्दोरा, खैरवानी, ढोब सिलादेही , जोलखेड़ा आदि। तो कुछ लोग देवगढ़ की ओर आगे बढ़े तो कुछ परतवाड़ा, वर्धा नदी के किनारे जा बसे। ( पूरी जानकारी मिलने पर आगे लिखुंगा)
धन्यवाद
मनोज देशमुख
जानकारी स्त्रोत- राजेश जी बारंगे
इतिहास की किताबें

मुलतापी समाचार द्वारा प्रस्‍तुत

Today is World Kidney Day.


World Kidney Day 2020

हर साल मार्च के दूसरे गुरुवार को ‘वर्ल्‍ड किडनी डे’ मनाया जाता है। इस साल दुनियाभर में यह खास दिन 12 मार्च को मनाया जा रहा है। वर्ल्ड किडनी डे के दिन हर साल एक खास थीम रखी जाती है। बता दें, इस साल विश्व किडनी डे की थीम “किडनी हेल्थ फॉर एवरीवन एवरीवेयर” रखी गई है। जिसका मतलब है “हर कहीं हर किसी के लिए किडनी स्वास्थ्य”।

कब से हुई शुरुआत

वर्ल्ड किडनी डे को मनाने की शुरुआत साल 2006 में हुई थी। जिसका उद्देश्य लोगों को किडनी से जुड़ी समस्याओं और उसके उपचार के बारे में जागरूक करना था। भारत में किडनी रोग से पीड़ित लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में इसके प्रति सतर्कता और जागरूगता बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं आखिर क्या हैं किडनी रोग के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय।

इन 7 बातों पर ध्यान नही देने के कारण हो सकती है किडनी की समस्या

बीते कुछ वर्षों में किडनी फेलियर के मामलों में काफी इजाफा हुआ है। इसकी मुख्य वजह है अनियमित जीवनशैली। ऐसे में उम्र से पहले किडनी को खराब या सिकुड़ने से बचाने के लिए कुछ आदतों को छोड़ना बहुत जरूरी है। आज विश्व किडनी दिवस है। ऐसे में आप आज से स्वस्थ किडनी की दिशा में एक कदम बढ़ा सकते हैं। 

1.  पानी कम पीना
पानी कम मात्रा में पीने से किडनियों को नुक़सान हो सकता है। पानी की कमी के चलते किडनी और मूत्रनली में संक्रमण होने का ख़तरा अधिक हो जाता है। साथ ही कम पानी से स्टोन का भी खतरा बना रहता है। 

2. स्मोकिंग और तम्बाकू सेवन 
वैसे तो यह आदत कई बीमारियों की वजह बन सकती है लेकिन धूम्रपान एवं तम्बाकू का सेवन से खासतौर पर  फेफड़े संबंधी रोग होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। वहीं, इससे किडनी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है। 

3. पेशाब रोककर रखना 
रात भर में मूत्राशय पूरी तरह मूत्र से भर जाता है, जिसे सुबह उठते ही खाली करने की ज़रूरत होती है। लेकिन जब आलस की वज़ह से लाग मूत्र नहीं त्यागते और काफी देर तक उसे रोके रहते हैं तो आगे चलकर यह किडनी को भारी नुकसान पहुंचाता है।

4. जंक फूड 
हर डॉक्टर आपको जंक फूड न खाने की सलाह देगा। ऐसे में हमेशा जंकफूड खाते रहना शरीर के लिए घातक हो सकता है। इसका असर सबसे ज्यादा किडनी पर पड़ता है। 

5. ज्यादा नमक का सेवन 
कम या ज्यादा नमक खाना सेहत के लिए हानिकारक है। हमारे द्वारा भोजन के माध्यम से खाया गया 95 प्रतिशत सोडियम गुर्दों द्वारा मेटाबोलाइज़्ड होता है। इसलिए नमक का अनावश्यक रूप से अधिक मात्रा में सेवन किडनी को कमजोर कर देता है। 

6. पेनकिलर का ज्यादा इस्तेमाल 
डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं की खरीद से बचें। बिना डॉक्टर की सलाह के दुकान से पेनकिलर दवाएं खरीदकर उनका सेवन किडनी के लिये खतरनाक हो सकता है। खासतौर पर बार-बार सिरदर्द की दवाई न लें। 


7. प्रोटीन सप्लीमेंट 
बॉडी बिल्डिंग करने के लिए लड़के अक्सर प्रोटीन सप्लीमेंट का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा लम्बे समय तक करने से किडनी को नुकसान पहूंच सकता है। प्राकृतिक तरीकों से फिटनेस पर ध्यान देना चाहिए। 

World Kidney Day 2020

मुलतापी समाचार बैतूल

आज भी जीवित है वर्षों पुरानी परम्परा



रोंढा बैतूल – होली का त्यौहार अपने अंदर अनेक विविधताओं को समेटे हुए हैं। भारत के हर प्रदेश, क्षेत्र व स्थान पर होली के त्यौहार की एक अलग परंपरा है। वही जिला बैतूल मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर ग्राम रोंढा में होलिका दहन के तीसरे दिन यानी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की तीज के दिन धुरेड़ी खेली जाती है जिसमें रंग और गुलाल लगाकर होली का त्यौहार मनाने की परम्परा है।

कुछ स्थानों पर होली के पांच दिन बाद पंचमी को रंगपंचमी खेलने की परंपरा भी है। धुरेड़ी पर गुलाल लगाकर होली खेली जाती है तो रंगपंचमी पर रंग लगाया जाता है। खासतौर पर इस दिन बच्चों, महिलाओं और युवकों की टोलियां गाँव की गलियों से निकलती है और रंग,गुलाल लगाकर खुशियों का इजहार करती है। रंगपंचमी होली का अंतिम दिन होता है और इस दिन होली पर्व का समापन हो जाता है।

इसी दिन गांव में दोपहर 12 बजे के बाद मेला भी लगता है जिसमें आसपास के दर्जनों गांवों के लोग सम्मिलित होते है। मेले में “जेरी तोड़ने” की भी परम्परा है। जेरी की लम्बाई लगभग 50 फीट है, जिस पर एक व्यक्ति जेरी के ऊपर चड़कर जेरी के शिखर पर रखे नारियल और पैसे की गठरी लाता है और नारियल को भगवान के चरणों में अर्पित करता है एवं पैसे उपहार के तौर पर स्वयं रखता है। इसके बाद मेले के समापन की घोषणा भी हो जाती है।

पुरानी परम्परा के अनुसार यदि जेरी नही टुटती है तो जतरा समाप्त नही होती है और अगले दिन भी जतरा लगी रहती है या पंचायत के आदेशानुसार समाप्त भी की जा सकती है। जतरा में आदिवासी समुदाय की महिलाएँ और पुरुषों के द्वारा ढोलक, मंजीरा और अन्य वाद्ययंत्रों को बजाते हुए, नाचना एवं फाग गीत गाया एवं फाग माँगने की अनुठी परम्परा है।

जिसे गाँव के लोग अपने गांव की भाषा में “जतरा” कहते है। और जतरा में संतरा, अंगुर, गाठी, नड्डा, फुटाना, खेल-खिलौने, आईस्क्रीम, गुब्बारे,झूलाघर सहित अन्य बच्चों के लिए सामान, महिलाओं के लिए चूडिय़ां, कंगन, अन्य जेवरात, चप्पल-जुते, घरेलु सामान जिसमें किचन सामग्री मुख्य रूप से होती है। पान-गुटखा, चाय का ठेला, गुपचुप के ठेले, समोसे, बड़े, जलेबी, नमकीन और विभिन्न रंगों की मिठाई की दुकानें लगती है जिससे जतरा की शोभा चौगुनी बड़ जाती है।

प्रदीप डिगरसे बैतूल मुलतापी समाचार

कायस्थ समाज ने की कलम- दवात व भगवान चित्रगुप्त की पूजा


मुलतापी समाचार मनोज कुमार अग्रवाल

दमोह: शहर के फुटेरा वार्ड नंबर 4 स्थित देव श्री चित्रगुप्त मंदिर में बुधवार की शाम कायस्थ समाज द्वारा अपने आराध्य देव भगवान चित्रगुप्त का पूजन व होली मिलन समारोह आयोजित किया गया! सर्वप्रथम शाम 7:00 बजे पुजारी नरेंद्र तिवारी के सानिध्य में कलम दबात की पूजा की गई! इसके बाद वेद मंत्रों के साथ भगवान चित्रगुप्त की पूजा व महाआरती की गई!

इसके बाद होली मिलन समारोह आयोजित किया गया जिसमें सभी ने एक दूसरे को तिलक लगाकर होली पर्व की शुभकामनाएं दी! इस मौके पर युवाओं ने समाज के सभी वरिष्ठ जन से आशीर्वाद लिया! इस मौके पर राकेश अर्गल, किरण खरे, गोविंद खरे, निर्गुण, पंकज खरे सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे!

मुलतापी समाचार