आज भी जीवित है वर्षों पुरानी परम्परा



रोंढा बैतूल – होली का त्यौहार अपने अंदर अनेक विविधताओं को समेटे हुए हैं। भारत के हर प्रदेश, क्षेत्र व स्थान पर होली के त्यौहार की एक अलग परंपरा है। वही जिला बैतूल मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर ग्राम रोंढा में होलिका दहन के तीसरे दिन यानी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की तीज के दिन धुरेड़ी खेली जाती है जिसमें रंग और गुलाल लगाकर होली का त्यौहार मनाने की परम्परा है।

कुछ स्थानों पर होली के पांच दिन बाद पंचमी को रंगपंचमी खेलने की परंपरा भी है। धुरेड़ी पर गुलाल लगाकर होली खेली जाती है तो रंगपंचमी पर रंग लगाया जाता है। खासतौर पर इस दिन बच्चों, महिलाओं और युवकों की टोलियां गाँव की गलियों से निकलती है और रंग,गुलाल लगाकर खुशियों का इजहार करती है। रंगपंचमी होली का अंतिम दिन होता है और इस दिन होली पर्व का समापन हो जाता है।

इसी दिन गांव में दोपहर 12 बजे के बाद मेला भी लगता है जिसमें आसपास के दर्जनों गांवों के लोग सम्मिलित होते है। मेले में “जेरी तोड़ने” की भी परम्परा है। जेरी की लम्बाई लगभग 50 फीट है, जिस पर एक व्यक्ति जेरी के ऊपर चड़कर जेरी के शिखर पर रखे नारियल और पैसे की गठरी लाता है और नारियल को भगवान के चरणों में अर्पित करता है एवं पैसे उपहार के तौर पर स्वयं रखता है। इसके बाद मेले के समापन की घोषणा भी हो जाती है।

पुरानी परम्परा के अनुसार यदि जेरी नही टुटती है तो जतरा समाप्त नही होती है और अगले दिन भी जतरा लगी रहती है या पंचायत के आदेशानुसार समाप्त भी की जा सकती है। जतरा में आदिवासी समुदाय की महिलाएँ और पुरुषों के द्वारा ढोलक, मंजीरा और अन्य वाद्ययंत्रों को बजाते हुए, नाचना एवं फाग गीत गाया एवं फाग माँगने की अनुठी परम्परा है।

जिसे गाँव के लोग अपने गांव की भाषा में “जतरा” कहते है। और जतरा में संतरा, अंगुर, गाठी, नड्डा, फुटाना, खेल-खिलौने, आईस्क्रीम, गुब्बारे,झूलाघर सहित अन्य बच्चों के लिए सामान, महिलाओं के लिए चूडिय़ां, कंगन, अन्य जेवरात, चप्पल-जुते, घरेलु सामान जिसमें किचन सामग्री मुख्य रूप से होती है। पान-गुटखा, चाय का ठेला, गुपचुप के ठेले, समोसे, बड़े, जलेबी, नमकीन और विभिन्न रंगों की मिठाई की दुकानें लगती है जिससे जतरा की शोभा चौगुनी बड़ जाती है।

प्रदीप डिगरसे बैतूल मुलतापी समाचार

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