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आंसू बहाती गई, इतिहास रचता गया….

आत्‍मकथा

मैं अकेली थी और वे चार थे

आंसू बहाती गई इतिहास रचिता गया इस लंबे सफ़र में 2651 दिन घुट घुट के आंसू बहाती गई इतिहास रचता गया मैंने ठान रखा था

मैं टूटूगींं तो इन चारों हत्यारों को लेकर टूटूगींं निर्भया की सिसकती आहें मुझे सोने नहीं देती थी

मेरी तो अंतिम इच्छा ही यह थी मैं तो इन चारों हत्यारों को लेकर ही टूटूगींं आगे पढि़ए

आंसू बहाती गई इतिहास रचा गया

मैं अपने पुराने दिनों को याद करती हैं, तो आश्चर्य होता है कि जब में बिना पिये दो-चार कदम भी नहीं चल पाती थी. अब तो मैं समय के साथ-साथ इतनी बदल गई है, जैसे रेगिस्तान में ऊँट एक-एक माह का पानी एक साथ पीकर लगातार चलता जाता है।

वैसे में अपनी व्यथा क्या सनाऊँ मैं तो वो मनचली हूँ, जिसने मुझे थामा बस उसकी ही उंगलियों थामें उसके भविष्य को संवारने में लग जाती हूँ। मेरे लिये न तो कोई उम्र की सीमा है. ना जाति का बंधना मुझे न तो कोई अमीर से लगाव है और न गरीब से परहेज, मैं तो स्वच्छन्द विचारों वालों के हाथों की कठपुतली हूँ, जो उसकी खुशी, गम, जज़बात, भावना और विचारों के अनुसार नाचती, आँसू बहाती जाती हूँ और इतिहास रचती जाती हूँ।

अक्सर मुझे लोग अपने दिल से लगाकर रखते हैं, हर कोई अपने दिल-दिमाग को संतुलित कर मुझे अपने हाथों में थामे अपनी कहानी, व्यथा सुनाता जाता है और मैं उसकी उंगलियाँ थामे आँसू बहाती चलती जाती हूँ। मैं तो वह दिवानी हूँ, जिसकी पनाह में जाती हूँ, उसका ही अस्तित्व बनकर रह जाती हूँ। ऋषि-मुनियों के हाथों लगी तो वेद और शास्त्र बन गये। न्याय के पुजारी ने छुआ तो न्याय का इतिहास रचती चली गई। कमजोर गरीब असहाय की तो अर्जी बन न्याय का दरवाजा खट-खटाती चली आ रही हूँ। किसी कलाकार की इच्छा अनुसार उसकी कलाकृति, किसी शायर की मनचाही शायरी और किसी कवि की भावनात्मक कविता, कल्पना और साहित्यकार की रचना रचकर लोगों का दिल जीत रही हूँ। मजे की बात तो यह है कि मैं तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, नेता, राजनेता, आई.ए.एस., आई.पी.एस. की वो ताकत हूँ, जिस रास्ते चली गई, गानों पत्थर की लकीर, तब तो लोग मुझे पूजते हैं, सम्मान देते हैं। नन्हें-मुन्ने बच्चे बड़े ही लगाव से अपनी नाजुक, नन्हीं-नन्हीं कोमल उंगलियों में थामे मुझे चलाने का प्रयास करते हैं और मैं उनका भविष्य संवारने में पूरा-पूरा सहयोग देती हूँ। गाँवों में कुछ महिला, बड़े-बूढ़े जब कभी पहली-पहली बार शर्माते हुए अपने हाथों में मुझे लेते हैं, तो उनके हाथ कांपने लगते हैं. तब मुझे बड़ा ही अजीब अहसास होता है। मुझे थामने वालों को, सभी को अपना सम्राट मानती हूँ और उसके इशारों पे नाचती हूँ, पर जब मैं लोगों को मेरे इशारे पर नाचता देखती हूँ तो मुझे बेहद खुशी के साथ-साथ पूर्ण तृप्ति मिलती है और मुझे अपनी अहमियत का पता चलता है। मेरी तो सदा उनके प्रति आस्था (श्रद्धा) रहती है, जो मुझे सही राह पर चलाते हैं।

मुझे अपने आप पर फक्र है, मैं टूटती भी हूँ तो पहले किसी हत्यारे के नाम मौत का पैगाम (Hanging till Death ) “हैगिंग टिल डैथ” लिख मेरे न्यायप्रिय सम्राट के हाथों मेरा रार-कलग कर दिया जाता है। वॉह रे मेरी किस्मत, मैं कोई और नहीं आपके हाथों की ही एक कलम हूँ।

कलमकार लेखक-श्रीवास अशोक (सम्राट), बैतूल

Mr Ashok Shrivash, Betul

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