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जप – तप और यज्ञ से महामारी के प्रकोप से बचता रहा ताप्ती – नर्मदाचंल अवैध रेत कारोबार एवं नदियों की उपेक्षा के चलते कोरोना ने अपने पांव पसारे

Multapi Samachar


इस समय पवित्र पुण्य सलिलाओ एवं आस्था विश्वास के चर्तुभूज खम्बो पर धर्म संस्कृति की प्रताका फहराता भारत उप महाद्धीप का गांव – शहर विदेशी सर जमीन (चीन) से आई कोरोना नामक महामारी के दंश से चिकित्सालय में पड़ा दम तोडऩे लगा है. बड़ी संख्या में अपने – अपने घरों में कैद टोटल लॉक डाउन में जकड़ा भारत का यह हाल कैसे हुआ यह जानना जरूरी है. नदियों के रूप और स्वरूप में तेजी से आए परिवर्तन एवं लोगो का धर्म कर्म काण्ड से विमुख हो जाने से पर्यावरण प्रदुषित हुआ और महामारी ने पांव पसार लिए. मध्यप्रदेश के सीमावर्ती बैतूल जिले एवं होशंगाबाद जिले की सीमा आपस में एक दुसरे से काफी किलोमीटर तक जुड़ी हुई है. जिले की सीमाओं को पश्चिम मुख्यी दो पुण्य सलिला नर्मदा एवं ताप्ती का निर्मल जल मिलता चला आ रहा है. इस समय यदि आकड़ो की बाते करे तो पता चलता है कि इन दोनो जिले में नर्मदा एवं ताप्ती के तेज एवं वेग के चलते महामारी ने अपनी आगोश में उतनी संख्या में लोगो को नहीं निगला जितनी संख्या में अन्य जिलो एवं प्रदेशो की आबादी को वह निगल चुका थी. बैतूल जिले में आकड़ो पर नज़र दौड़ाए तो पता चलता है कि जिले में पहली बार 1864 – 65 में हैजा फैला था. 1877, 1889, 1892,1895,1897, 1900 तक लगातार छै वर्षो तक यह महामारी फैली रही. एक हजार से अधिक मौते हैजा के कारण हुई. हालांकि 1901 से 1905 तक पूरा जिला हैजा मुक्त रहा. 1900 में हुई प्रति हजार पर 12 मौतो का आकड़ा चौकान्ने वाला था क्योकि इस दौर में मौते 3 हजार 608 हुई थी. 1906 में एक बार फिर हैजा फैला जिसमें 166 मौते हुई. वर्ष 1912 में 919 एवं 1916 में 431 मौते हुई. 1929 में सबसे अधिक 2,609 मौते हुई. 1938 में 4767 1945 में 1,081 तथा आजादी के बाद 1953 में 1,212 मौते हुई. पानी के संक्रमण के कारण सर्वाधिक मौतो पर पोटाश परमेग्रेट डाल कर जिले के गांवो एवं शहरो का जलशुद्धि करण कर इस बीमारी पर नियंत्रण पाया गया. हालांकि इस दौरान बड़ी मात्रा में हैजा निरोधक टीके एवं दवाओ का वितरण किया गया. भारत से हैजा से होनी वाली मौते एक प्रकार से रूक गई और आजादी के 70 सालो में इस बीमारी से मौत का प्रतिशत शुन्य रहा.
1904 में फैली प्लेग की 1942 में बिदाई
चेचक ने पांव पसारे
इसे अपवाद कहे या कुछ और ही जिसके अनुसार भारत में 1896 में महामारी बने प्लेग की एक वर्ष बाद 1897 प्लेग का टीका बन चुका था. इस महामारी ने अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दू बेतूल में 1904 में दस्तक दी. अग्रेंजो द्वारा 1823 को बनाए गए बेतूल वर्तमान जिला मुख्यालय (बदनूर) में 1904 में प्लेग से 35 मौते हुई. इस वर्ष ही प्लेग ने बैतूल नगर से गांवो की ओर पांव पसारे. वर्ष 1908 में जिले में प्लेग पूरी तरह से फैल चुका था. इस वर्ष 534 मौते हुई. इसके बाद लगातार 2 वर्षो 1911 में 104 तथा 1912 में 308 मौते हुई. वर्ष 1913 में प्लेग अधिकारी एवं कर्मचारी की नियुक्ति के साथ पूरे जिले में इस महामारी से लडऩे का मास्टर प्लान तैयार किया गया. जिसके चलते 4 वर्षो तक न तो प्लेग फैल सका और न उससे किसी प्रकार की मौते हुई लेकिन1917, 1918,1919 में एक बार फिर प्लेग ने पंाव पसार लिए जिसके चलते बड़ी संख्या में लोगो की मौते हुई.1920 में 227 लोगो की मौत ने पूरे जिले को चौका डाला.1942 को बैतूल जिले से पूरी तरह से बिदा हो चुकी प्लेग ने 1928 में 742 तथा 1929 में 556 लोगो को अपने काल के गाल में जकड़ लिया.
बैतूल जिले में चेचक जैसी महामारी की 1977 में भारत से बिदाई
गुलाम एवं आजाद भारत के 59 सालो में 2 हजार से अधिक मौते
मध्यप्रांत के गठन के बाद 1896 से लेकर 1955 के बीच बैतूल जिले में चेचक (शीतला, बड़ी माता, स्मालपोक्स) से मरने वालो की संख्या 2,324 थी. चेचक एक विषाणु जनित रोग है. श्वासशोथ एक संक्रामक बीमारी थी, जो दो वायरस प्रकारों (व्हेरोला प्रमुख और व्हेरोला नाबालिग) के कारण होती है. इस रोग को लैटिन नाम व्हेरोला या व्हेरोला वेरा द्वारा भी जाना जाता है. बैतूल जिले से ही नहीं पूरें देश से 26 अक्टूबर 1977 को चेचक बड़ी माता की बिदाई हो गई. एक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1796 में चेचक (बड़ी माता ) महामारी के रूप में सामने आई इस बीमारी का 1798 में एडवर्ड जेनर द्वारा चेचक के टीके की खोज की गई. 19वीं सदी के दौरान भारत में वायरस जनित रोगों से निपटने के कदम तेज हुए. इसके तहत वैक्सीनेशन को बढ़ावा दिया गया, कुछ वैक्सीन संस्थान खोले गए. कॉलरा वैक्सीन का परीक्षण हुआ और प्लेग के टीके की खोज हुई. बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में चेचक के टीके को विस्तार देने, भारतीय सैन्य बलों में टायफाइड के टीके का परीक्षण और देश के कमोबेश सभी राज्यों में वैक्सीन संस्थान खोलने की चुनौती रही. आजादी के बाद बीसीजी वैक्सीन लैबोरेटरी के साथ अन्य राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किए गए. 1977 में देश चेचक मुक्त हुआ. टीकाकरण का विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआइ) का श्रीगणेश 1978 में हुआ.सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम 1985 में शुरू हुआ था. बैतूल जिले में 1956 से लेकर 1964 तक 9 वर्षो के प्रथम चरण में 2 लाख 1 हजार 414 लोगो को चेचक का टीका लगाया गया. द्धितीय चरण में इन 9 वर्षो में चेचक बड़ी माता के टीकाकरण के अभियान के तहत 6 लाख 33 हजार 673 लोगो को टीका लगवाया गया.
महामारी की रोकथाम के लिए
पंचामृत से बांधे गए गए गांव
बैतूल जिले के अधिकांश गांवो में चेचक,हैजा, प्लेग की महामारी के लिए ग्रामिणो द्वारा गांवो को पंचामृत से बांधा गया. बैतूल जिला मुख्यालय से लगे ग्राम रोंढ़ा के सेवानिवृत वनपाल श्री दयाराम पंवार के अनुसार गांव को दुध – दही – शहद – घी – गौमूत्र के मिश्रण की एक बहती धारा के साथ गांव की चर्तुभूज सीमाओ को बांधा गया. ग्रामिणो का विश्वास और आस्था ने अपना असर दिखाया और गांव पूरी तरह से महामारी के प्रकोप से मुक्त हो गया.
2012 में पूरी तरह से पोलियो मुक्त हुआ
मध्यप्रदेश का आदिवासी बैतूल जिला
महामारी के आते – जाते प्रभावो से बैतूल जिला पूरी तरह से प्र्रभावित रहा. जिले में यूं तो मलेरिया, क्षय रोग विषाक्त वायरस के चलते दस्तक दे चुके है. जिले ने वर्ष 2012 में पोलियो से जिले को मुक्ति मिल गई. बैतूल जिले में इस वर्ष मार्च में कोरोना जैसी महामारी की दस्तक ने सभी को चौका दिया. 21 दिन के लॉक डाउन के बाद जिला पूरी तरह से घर में कैद हो गया जिसके कारण जिले में मात्र एक व्यक्ति ही इस बीमारी से संक्रमित पाया गया. जिले में कोरोना की दस्तक ने एक बार फिर सवाल उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
कोरोना की बीमारी का कारण क्या !
जल – थल – वायु सभी पूरी तरह से प्रदुषित
बैतूल जिले में कोरोना की दस्तक का कारण भले ही तबलीगी जमात से जुड़े लोग रहे हो लेकिन सवाल यह उठता है कि जिले में इस महामारी संक्रामण फैला कैसे और क्यों ! अकसर कहा जाता है कि बीमारी को फैलाने में हवा और पानी का सबसे अधिक जवाबदेह होते है. जिले के गांव – गांव तक इस बीमारी के फैलने के प्रमुख कारणो पर यदि गौर किया जाए तो पता चलता है कि बीते 3 दशको में ताप्ती एवं नर्मदाचंल में वायु प्रदुषण बढऩे से यहां का पर्यावरण प्रदुषित है. बैतूल – होशंगाबाद जिले की दो प्रमुख नदियों सहित जिले की नदियो एवं नालो में बड़े पैमाने पर रेत के लिए अवैध उत्खनन ने जिले की नदियो से लेकर नालो तक को प्रदुषित किया है. बैतूल या होशंगाबाद जिले में बड़े पैमाने पर नदियों से ही जल आपूर्ति की जाती है. ऐसे में कोरोना के वायरस का गांव – गांव तक या घर – घर तक प्रवेश का एक माध्यम प्रदुषित जलआपूर्ति भी हो सकती है. इस समय जानकार लोग इन जिलो में संक्रामक बीमारो से अन्य प्रदेश एवं जिलो में होने वाली मौतो के अनुपात में कम मौतो के लिए जिले की पवित्र पुण्य सलिलाओ को मानते है. भले ही बीते एक दशक में नदियों के किनारे धार्मिक आयोजन यज्ञ एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रम जिसमें बड़े पैमाने पर डाली जाने वाली आहूति से वायु प्रदुषण की रोकथाम होती है. शुद्ध हवा के लिए यज्ञ संस्कार जरूरी है
ताप्ती – पूर्णा – नर्मदा की उपेक्षा ने
कोरोना जैसी महामारी को दिया संरक्षण
बैतूल जिले मे एक मात्र संक्रामक रोगी भैसदेही का व्यक्ति मिला. भैसदेही पुण्य सलिला चन्द्रपुत्री पूर्णा का जन्म स्थान है. आज प्रदेश की नदियों की तरह पूर्णा भी उपेक्षित एवं प्रदुषित है. पूर्णा घाटी को लेकर बना गए पूर्णा पुर्न:जीवन प्रकल्प के दम तोडऩे के बाद नर्मदा एवं ताप्ती को प्रदुषण मुक्त करने की कोई ठोस नीति या रीति सामने नहीं आई. नदियो की उपेक्षा एवं उनके किनारो के रख रखाव तथा घाटो के बड़े पैमाने पर निमार्ण न होने के कारण नदियों ने अपना स्वरूप विकृत कर लिया. बीते एक दशक से नदियों के किनारे धार्मिक यज्ञ संस्कार कम अवैध रेत का कारोबार फल – फूल रहा है. जिसके कारण इन दोनो जिले की हवा और पानी दोनो ही प्रदुषण की मार के शिकार हो चुके है. जमीनी प्रदुषण का प्रमुख कारण गगन चुम्बती इमारतो एवं अवैध अतिक्रमण के साथ जिले में बड़े पैमाने पर नगरीय निकायो एवं ग्राम पंचायतो द्वारा बनवाए गए कचरा घरो से है जो हजारो टन कचरा एकत्र कर जिले में ऐसे स्थानो की संख्या में बढ़ोतरी लाए हुए जिन्हे सरकारी भाषा में प्रेचिंग गाऊण्ड कहा जाता है जहां पर पूरे शहर का पन्नी प्लास्टीक सड़ता या फिर जलता हुआ प्रदुषण का जनक बना हुआ है. आज जरूरत है कि महामारी से बचने के लिए हम बड़े पैमाने पर अपने जल – थल – नभ को प्रदुषण मुक्त रखे ताकि इन तीनो के माध्यम से कोई जानलेवा महामारी अपने पांव पसार न सके.
इति

मुलतापी समाचार – रामकिशोर दयाराम पंवार

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