यह कैसा मजबूर दिवस है, मजदूर दिवस पर कविता – अशोक श्री

मुलतापी समाचार

”1 मई मजदूर दिवस”

यह कैसा मजदूर दिवस!

मना रहे हम मजबूर दिवस

हाथ अकड़ गए, पैर जकड़ गए।

कर करके आराम

यह कैसा मजदूर दिवस!

सुनसान रास्‍ते, विरान खेत

अधूरी इमारत

लिख रही हैंं अपनी इबारत

राह तकती पेड़ की छांव

कहती है क्‍यू रूक गये है तेरे पांव

आज क्‍यों मजबूर हैं मेरा यार

मैंंने कहा मना रहा आज वो ‘ मजबूरि‍ दिवस’

अशोक श्री

यह कैसा मजदूर दिवस है, मजदूर दिवस के अवसर पर कविता – अशोक श्री जी द्वारा लिखित कविता जिसमें मजदूरोंं के मन की बात कही गयी है आज पुरा देश कोरोना वैश्‍यविक महामारी की मार झेल रहा है जिससे पूरे देश में लॉकडाउन किया गया है जिसके कारण आज मजदूर सबसे ज्‍यादा परेशान रहो रहा है दोहरी मार झेल रहा है, न तो अपना दुख बाट सकता है और न ही बता सकता है उसी एक उदारहण कविता द्वारा आज की हाल के अनुसार मजदूर दिवस न कह कर मजबूद ि‍दिवस संबोधित कर रहा मजदूर कविता के माध्‍य से प्रसतुत

अमेरिका में जबरदस्त हड़ताल से हुई मई दिवस की शुरुआत, मानी गई 08 घंटे की शिफ्ट की बात

पूरी दुनिया कोरोना वायरस के साये मई दिवस मना रही है. मई दिवस का मतलब मजदूरों का अंतरराष्ट्रीय दिवस, हालांकि इसकी शुरुआत अमेरिका में जबरदस्त हड़ताल से हुई थी. जिसमें मालिकों को 08 घंटे की शिफ्ट की बात माननी पड़ी थी

कोरोना महामारी के साये में आज (1 मई) पूरे विश्व में मजदूर दिवस (Labour Day 2020) मनाया जा रहा है. हालांकि ये बात जानना बहुत रोचक है कि मई दिवस की शुरुआत कैसे और कहां हुई. वैसे हम आपको बता दें कि मई दिवस ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश को हिलाकर रख दिया था.

मजदूर दिवस नहीं विद्रोह और शहादत का दिवस है 01 मई. ये वो दिन है जब दुनिया की सबसे ताकतवर देश के मजदूरों ने अपने मालिकों के खिलाफ विद्रोह कर दिया. वे सड़कों पर उतर आए. हड़ताल पर बैठ गए.

यह मामला अमेरिका का था. वहां की कंपनियों में काम करने वाले वकर्स ने काम के घंटे आठ करने की लंबी मांग के बाद काम बंद कर दिया. हड़ताल शुरू हुए अभी चार दिन भी नहीं हुए थे कि अमेरिका के शिकागो के मार्केट में एक धमाका हुआ. मजदूरों की हड़ताल के बीच इस जबरदस्त धमाके ने प्रशासन का धैर्य तोड़ दिया.

इसके बाद 4 मई को पुलिस ने प्रदर्शनकारी मजदूरों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं. बताया जाता है‌ कि इसमें दर्जनभर से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई. इसके चलते पूरे अमेरिका में दहशत का माहौल फैल गया.

हालांकि कुछ ही दिनों में सबकुछ सामान्य हो गया. मजदूरोंं की हड़ताल का फायदा ये हुआ कि उनकी आठ घंटे की शिफ्ट की मांग मान ली गई, तभी से आठ घंटे की शिफ्ट की शुरुआत हुई. कई कंपनियों ने मजदूरों की मांगे मान ली. इसके बाद पेरिस में साल 1889 में फिर से फिर मजदूर इकट्ठा हुए. इसे अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का नाम दिया गया. इसमें पहली बार 1886 के मई महीने में जान गवाने वाले मजदूरों को याद करते हुए 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया गया.

इसी के बाद से 1 मई को मजदूरों ने खुद-ब-खुद छुट्टी मनानी शुरू कर दी. इसके बाद धीरे-धीरे दुनिया के सभी प्रमुख देशों को 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना पड़ा. हालांकि असल में वो कौन शख्स था जिसने 1 मई को मजदूर दिवस मनाने की पेशकश की थी, इसका आज तक पता नहीं चल पाया है क्योंकि माना जाता है कि एक सर्वसम्मति से लिया गया एक फैसला था. इसके बाद खुद-ब-खुद पूरी दुनिया के मजदूर इससे जुड़ते गए.

भारत में मजदूर दिवस (Labour Day In India) की शुरुआत चेन्नई में 1 मई 1923 को हुई. तब भारतीय मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार इस वैश्‍विक दिवस की भारत में शुरुआत करने पर अड़े थे. चेट्यार के नेतृत्व में मद्रास हाईकोर्ट सामने बड़ा प्रदर्शन किया गया. इस दौरान दत्तात्रेय नारायण सामंत उर्फ डॉक्टर साहेब और जॉर्ज फर्नांडिस ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी. तभी ये दिन भारत में भी एक राष्ट्रीय अवकाश का दिन बन सका.

मनमाेेेेहन पंवार (प्रधान संपादक) मुलतापी समाचार

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