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सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं पद्मश्री कवि हलधर नाग, पांच छात्रों ने उनपर की है पीएचडी, संभलपुर विश्वविद्यालय में ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ मिली जगह, जो कोसली भाषा के प्रसिद्ध कवि


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प्रतिभा सम्‍मान पद्मश्री प्राप्‍त कवि हलधर नाग

कभी बर्तन धोते और खाना बनाते थे ये राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता

सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं पद्मश्री कवि हलधर नाग, पांच छात्रों ने उनपर की है पीएचडी

ओड़िशा के हलधर नागजी जो कोसली भाषा के प्रसिद्ध कवि है।उन्होंने जो भी कविताऐं, 20 महाकाव्य अभी तक लिखे है,अब संभलपुर विश्व विद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा।

ऐसे हीरे को चैनल वालों ने नही,मोदी सरकार ने पद्मश्री के लिए खोज के

नई दिल्ली, हलधर नाग ने इस बात को साबित किया है की किताबी ज्ञान या डिग्री से ऊपर है ज्ञानी और विद्वान होना। ज्ञानी और बुद्धिमान व्यक्ति की विद्वता हर स्थिति में बाहर आती है। कवी हलधर नाग को पद्म श्री पुरस्कार मिला है तब से वह लगातार चर्चा में हैं।  

मजबूत कद काठी वाले गहरे श्याम वर्ण के कवि हलधर नाग पद्म पुरस्कार लेते समय भी हलधर नाग नंगे पैर थे। कवि हलधर नाग मात्र तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं। उनपर पांच शोधार्थियों ने अपना पीएचडी पूरा किया है। 

यहां हम जिनके बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने एक अलग प्रवत्ति को जन्म दिया है। शिक्षा वह नहींं, जो सिर्फ किताब से ली गई हो। शिक्षा उस शैली का नाम है, जो इंसान अपनी खूबी, प्रतिभा को निखार कर सिद्ध करता है।

हलधर नाग, जो मुश्किल से तीसरी कक्षा तक भी नहीं पढ़े है, को वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं, उनपर पांच शोधार्थियों ने अपना PHD पूरा किया है। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या ख़ास है, उ़ड़ीसा के रहने वाले हलधर नाग में।

Haldhar Nag

ओडिशा के रहने वाले 66 वर्षीय हलधर नाग कोसली भाषा के कवि हैं। उन्होंने अब तक हज़ारों कविताएं और 20 महाकाव्य लिखे हैं। अपने लिखी हुई तमाम रचना उन्हें ज़ुबानी याद हैं। अब संभलपुर विश्वविद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। 

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सादा लिबाज, सफेद धोती और बनियान पहने, नाग हमेशा नंगे पैर ही रहते हैं। उनकी सोशल मीडिया पर उनकी सादगी वाली फोटो खूब वायरल हो रही है। कवि हलधर नाग दिन भर में कम से कम ३ आयोजन करते हैं जिसमें वह लोगों को अपना लिखा पढ़ कर सुनाते हैं। कवी हलधर नाग कहते हैं उन्हें देख कर ख़ुशी मिलती है कि उनकी रचना को आज के युवा भी बड़ी चाव से सुनते हैं।  

वर्ष 1950 में जन्में कवि हलधर नाग के पिता कि जब वह तीसरी कक्षा में थे तभी मृत्यु हो गई थी।  तब वह महज 10 साल के थे। उन्हें पिता की मृत्यु के कारण कम उम्र में ही नौकरी छोड़नी पड़ी थी। परिवार की जिम्मेदारी तीसरी कक्षा में ही उनके कंधे पर आ गई थी। उन्होंने तब ढाबों पर बर्तन धोने तक के काम किये।   

उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन तब आया जब वह एक स्थानीय उच्च विद्यालय बावर्ची की  करने लगे। १६ साल तक बावर्ची की नौकरी करने के दौरान उनकी मुलाकात एक बैंकर से हुई। उन्होंने उस से 1000 रुपए का क़र्ज़ लिया और एक छोटी सी दूकान खोली, जिसमें बच्चों के जरूरत की चीजें उपलब्ध थी।

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 इसी दौरान नाग ने अपनी पहली रचना ‘धोडो बरगच’ ( द ओल्ड बनयान ट्री) लिखी। फिर उसके बाद सिलसिला चल निकला जो आज भी जारी है। अपनी पहली लिखी कविता को उन्होंने स्थानीय पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजा। 

66 वर्षीय हलधर नाग कोसली भाषा के प्रसिद्ध कवि हैं। ख़ास बात यह है कि उन्होंने जो भी कविताएं और 20 महाकाव्य अभी तक लिखे हैं, वे उन्हें ज़ुबानी याद हैं। अब संभलपुर विश्वविद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। सादा लिबाज, सफेद धोती और बनियान पहने, नाग नंगे पैर ही रहते हैं।

हलधर नाग जो कुछ भी लिखते हैं, उसे याद करते हैं। आपको बस कविता का नाम या विषय बताने की ज़रूरत है। उन्हें अपने द्वारा लिखे एक-एक शब्द याद हैं। वह एक दिन में तीन से चार कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, जिनमें वह अपनी लिखी रचनाएं लोगों को सुनाते है। नाग कहते हैंः

“यह देखने में अच्छा लगता है कि युवा वर्ग कोसली भाषा में लिखी गई कविताओं में खासा दिलचस्पी रखता है।”

लधर नाग का जन्म 1950 में बारगढ़ जिले के एक गांव में गरीब परिवार में हुआ। नाग ने मात्र तीसरी कक्षा तक ही अपनी शिक्षा ली, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तब वह महज 10 साल के थे।

पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उनकी माली हालत और बिगड़ती चली गई। उन्होंने अपने परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हुए छोटी उम्र में ही एक स्थानीय मिठाई की दुकान पर बर्तन धोने का काम किया।

करीब दो साल बाद, नाग ने एक स्थानीय उच्च विद्यालय में 16 साल तक एक बावर्ची के रूप में काम किया। नाग बताते हैंः

“वक़्त के साथ इस क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल बनाए गए। तब मेरी मुलाकात एक बैंकर से हुई। मैंने उनसे 1000 रुपए का क़र्ज़ लेते हुए एक छोटी सी दूकान खोली, जिसमें बच्चों के स्कूल से जुड़ी, खाने की चीज़ें उपलब्ध थी।”

यही वह दौर था, जब नाग ने 1990 में अपनी पहली कविता ‘धोडो बरगच’ ( द ओल्ड बनयान ट्री) लिखी। इस कविता को उन्होंने स्थानीय पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजा। उन्होंने पत्रिका को चार कविताएं भेजी थी, और सभी रचनाएं प्रकाशित हुई।

“यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी और इस वाकये ने ही मुझे और अधिक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने अपने आस-पास के गांवों में जाकर अपनी कविताएं सुनाना शुरू किया और मुझे लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।”

उडीसा में लोक कवि रत्न के नाम से मशहूर नाग की कविताओं के विषय ज़्यादातर प्रकृति, समाज, पौराणिक कथाओं और धर्म पर आधारित होते हैं। वह अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने की ओर तत्पर रहते हैं।

नाग कहते हैं कि मेरे विचार में कविता का वास्तविक जीवन से जुड़ाव और उसमें एक समाजिक सन्देश का होना आवश्यक है।

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मनमोहन पंवार (संपादक) 9753903839