Tag Archives: इतिहास

रानी पद्मावती और चित्तौड़गढ़ का इतिहास


ईसवी सन 1303 में रानी पद्मावती ना मिल पाने व उसकी मृत्यु से अलाउद्दीन खिलजी पागल सा हो गया था। वह अपने को छला हुआ महसूस करने लगा था। पूरे 8 माह युद्ध के बाद भी वह पद्मावती को ना पा सका। किंतु अब चितौड़ उसके अधीन था।

रानीपद्मावती की जौहर अग्नि ।
खिलजी को कर गयी छलनी ।।

इसके पश्चात मध्य व दक्षिण भारत में विजय के लिए उसने अपने सेनापति मुल्तानी को भेजा। सन 1305 ईसवी में मालवा पर अधिकार करने के लिए खिलजी की सेना आगे बढ़ी। उस समय मालवा पर पंवार राजा महलक देव का राज था। जैसे ही खबर मिली कि खिलजी की विशाल सेना मालवा पर अधिकार करने आ रही है, राजा महलक देव ने तुरंत सेना तैयार की और युद्ध के लिए रवाना हो गए। उन्होंने खिलजी की सेना को रतलाम के पास ही रोक लिया। दोनो सेनाओं में युद्ध होने लगा। राजा महलक देव के नेतृत्व में पंवार सैनिक कुशलता से लड़ रहे थे। पंवारो से युद्ध मे खिलजी की सेना के होश उड़ गए। उस युद्ध मे अब तक 700 मुस्लिम सैनिक मारे जा चुके थे तो वही पंवारो के 500 सैनिक। खिलजी के सेनापति ने अपने सैनिको को हिम्मत हारते देख तुरंत सैनिक सहायता की मांग की खिलजी ने तुरंत सैनिक भेज दिये और साथ ही अच्छे हथियार भी पहुचाये गये।और सैनिक टुकड़ी आते देख पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। राजा महलक देव ने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। क्योंकि ख़िलजी के सैनिक संख्या में ज्यादा थे साथ ही उनके पास अन्य सैनिको द्वारा अच्छे हथियार लायें गये थे। बचे हुए सैनिक और राजा महलक देव पीछे लौटते हुये मांडू आ गये। उस युद्ध मे मरे हुये सैनिको के साथ 12 बाई सती हो गई थी।राजा महलक देव के पीछे हटने के बाद भी खिलजी की सेना ने उनका पीछा किया और मांडू तक आ गये। वहाँ भी युद्ध होने लगा। सेनापति मुल्तानी ने राजा महलक देव को मार दिया। राजा महलक देव की मृत्यु से पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। मांडू को घेर लिया गया। सभी पवाँर सैनिक वहाँ से भागने लगे। इस हार से पंवारो ने अपनी आन बान और संस्कृति बचाये रखने के लिए मालवा क्षेत्र से पलायन का विचार किया। कुछ पंवार धार के आस पास के गांव में बस गए। पंवारो ने राजा महलक देव के पुत्र संजीव कुमार को धारा नगरी का नया राजा घोषित किया गया। ( इतिहास में वर्णित आधार पर)

रतलाम युद्ध मे हार के बाद पवाँर सैनिक अपने साथ जरूरत के सामान ले अपने-अपने परिजनों के साथ वहाँ से पलायन कर नर्बदा किनारे वर्तमान पवारखेड़ा( होशंगाबाद) तक आये और वहाँ से नर्बदा जी को पार कर पहला पड़ाव डाला। जिसमें 72 कुल के लोगो ने पलायन किया था।। युद्ध से थके हारे सैनिक और उचित खान पान की व्यवस्था ना हो पाने के कारण बच्चे, बूढे और महिलाएं बीमार होने लगीं। तभी कुछ बुजुर्गों ने इस बीमारी को देवी का प्रकोप समझ पूजा भंडारा की सलाह दी। सभी पंवारो ने मिल कर चंदा जमा किया जिससे 1200 रुपये जमा हुए। इन पैसों से विशाल भंडारा व देवी पूजा की गई। जिसमें आस पास के बहुत से लोग शामिल हुए थे।(भाट से मिली जानकारी पर) पंवारो ने जहाँ पहला पड़ाव डाला था वह स्थान पवारखेड़ा नाम से जाना जाने लगा। अपने मूल स्थान से नये वातावरण में भटके शाकाहारी धार्मिक पवाँर जाती दिनों दिन दुर्बल होती जा रही थी। उन्होंने वहाँ से सतपुडा के जंगलों में आगे बढ़ते हुए दूसरा पड़ाव वर्तमान धार गांव में डाला। कहाँ वह राजसी ठाठ बाट और कहाँ यह वनवासी जीवन पवाँर जाति की हालत में अब भी कोई ज्यादा सुधार नही हुआ था। रतलाम युद्ध मे घायल कुछ लोग मर चुके थे जिसके कारण स्थति दयनीय थी। जंगलों में रहने वाले गोंड जाति के लोग दुबले पतले पंवार को देख उन पर हँसते औऱ मांस मदिरा सेवन की बात बताते। उस समय गोंड जाति जंगलों में शिकार व महुआ की दारू का सेवन करती थी। जंगल के वातावरण में यह भोजन उनके अनुकूल भी था। इन जंगलों में शाकाहारी जीवन शरीर के लिए अनुकूल ना होने के कारण कुछ बुजुर्गों ने मांस व मदिरा का भक्षण उचित समझा।

उस समय वहाँ के गोंड राजा नरसिंह राय प्रथम थे। उन्हें खबर मिली कि कुछ राजपूत सैनिक युद्ध में हारकर उनके राज्य में आये हैं तो वे उनसे मिलने आये उनकी दुर्बलता को देख उन्होंने भी मांस खाने की सलाह दी। पवाँर लोगो ने धार गांव के समीप ही जनेऊ को निकाल कमर में बांध लिया तो कुछ लोग जनेऊ को नर्मदा जी मे प्रवाहित कर आये।राजा नरसिंह राय राजपूत लोगो की शक्ति से भली भांति परिचित थे। उन्होंने पंवारो को अपनी राजधानी बुलाया और सभी की अच्छी आवभगत करी। और वही बस जाने को कहाँ। वह क्षेत्र बदनूर (वर्तमान बैतूल ) के पास था। गोंड राजा ने उन्हें महाजन करके संबोधित किया और गाँव बसाने के लिए जमीन दान दी। वर्तमान में बैतूल के पास रोंढा , भडूच, बैतूल बाजार , खेड़ी, गाँव मे आज भी पवाँर अपने महाजनी ठाठ बाट से रहते हैं। और अपने को महाजन बताते हैं। गोंड राजा से मित्रता के बाद पंवारो ने उनकी मदद का आश्वासन दिया। खेड़ला किला का निर्माण राजा नरसिंह राय ने 14 वी सदी में किया था। जिसमे पवाँर जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान में यह किला खंडहर का रूप के चुका है। यहाँ खजाने की खोज में कई बार खुदाई की गई है। खुदाई से पता चला है कि वहाँ सूर्य मंदिर भी था। सूर्य मंदिर पंवारो के अग्नि उपासक होने के प्रमाण है। भले ही राज्य छूट गया पंरतु वे अपनी सांकृतिक विरासत को कभी नही भूले। अपनी बोली, पहनावा, रीति रिवाज नही भूले ।

बैतूल से आगे बढ़ते हुये पवाँर समाज ताप्ती उदगम मुलताई तक पहुँच गये। वहाँ उन्होंने कई गांव बसाए जैसे चन्दोरा, खैरवानी, ढोब सिलादेही , जोलखेड़ा आदि। तो कुछ लोग देवगढ़ की ओर आगे बढ़े तो कुछ परतवाड़ा, वर्धा नदी के किनारे जा बसे। ( पूरी जानकारी मिलने पर आगे लिखुंगा)
धन्यवाद
मनोज देशमुख
जानकारी स्त्रोत- राजेश जी बारंगे
इतिहास की किताबें

मुलतापी समाचार द्वारा प्रस्‍तुत

Mandu Utsav 2019 : धरोहर की गोद में दिखे कला- संस्कृति के रंग


Mandu Utsav 2019: पर्यटन नगरी मांडू में पांच दिवसीय खोजने में खो जाओ विचार पर आधारित मांडू उत्सव का शुभारंभ शनिवार को हुआ।

मांडू। Mandu Utsav 2019 मांडू में पांच दिवसीय उत्सव का शुभारंभ मां नर्मदा आरती के साथ हुआ। शनिवार शाम पर्यटन मंत्री सुरेंद्रसिंह बघेल ने रेवा कुंड पहुंचकर महाआरती की। रात में देश के जाने-माने बैंड दल प्रेम जोशून ने प्रस्तुति देकर श्रोताओं को आनंदित कर दिया। कला और संस्कृति का नया अध्याय उत्सव के माध्यम से शुरू हुआ। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद एडवेंचर स्पोर्ट्स हुए। प्रभारी मंत्री विजयलक्ष्मी साधौ और पर्यटन मंत्री सुरेंद्रसिंह बघेल ने उत्सव के तहत आर्ट एंड कल्चरल डिस्ट्रिक्ट का उद्घाटन किया।

भोज उत्सव की शुरुआत

धार में दो दिवसीय भोज उत्सव की शुरुआत प्रदेश सरकार के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने शनिवार रात किया। पहले दिन शोध संगोष्ठी हुई और रविवार को अंतिम राजा भोज पर आधारित नाटक का मंचन होगा।

पर्यटन नगरी मांडू में पांच दिवसीय खोजने में खो जाओ विचार पर आधारित मांडू उत्सव का शुभारंभ शनिवार को जिले के पर्यटन मंत्री सुरेंद्रसिंह हनी बघेल एवं जिले की प्रभारी व संस्कृति मंत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ ने किया। कारवां सराय में लगे हैंडीक्रॉफ्ट एवं स्थानीय वस्तुओं पर आधारित प्रदर्शनी मेले का फीता काटकर शुभारंभ करते हुए प्रदर्शनी का अवलोकन किया। मेले में देशभर के 40 से अधिक कलाकारों ने अनूठे तरीके से प्रदर्शनी को संजोया। शाम को मां रेवा कुंड पर मां नर्मदा की आरती की गई। कारवां सराय में जिले के दोनों मंत्री व विधायकों ने ढोल-मांदल पर जमकर नृत्य किया। वहीं देर शाम इंडियन ओशियन बैंड दल ने शानदार प्रस्तुति दी। मां रेवा… जैसे ही गूंजा, पूरा परिसर झूम उठा। इस बार पर्यटन मंत्री की विशेष रुचि के चलते मांडू उत्सव को महा उत्सव का रूप दिया गया है। यही वजह है कि उत्सव के पहले ही दिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।

उत्सव का औपचारिक शुभारंभ दोपहर 3.30 बजे कारवां सराय में टाट का फीता काटकर कि या गया। इसके पूर्व कारवां सराय में मंत्रियों एवं अतिथियों की अगवानी पारंपरिक भगोरिया नृत्य के साथ की गई। ढोल-मांदल नृत्य दल ने समूचे क्षेत्र में भगोरिया की मादकता घोल दी। कारवां सराय में अतिथियों का आगमन कि या गया। प्रदर्शनी का अतिथियों ने करीब डेढ़ घंटे तक अवलोकन किया। इस दौरान धरमपुरी विधायक पांचीलाल मेड़ा, मनावर विधायक डॉ. हीरालाल अलावा, सरदारपुर विधायक प्रताप ग्रेवाल आदि मौजूद थे।

गूंजा रेवा कुंड परिसर

पर्यटन मंत्री सुरेंद्रसिंह बघेल एवं धरमपुरी विधायक पांचीलाल मेड़ा की उपस्थिति में ओंकारेश्वर के पं. गिरजाशंकर ने रेवा कुंड पर पहले मां नर्मदा का कलश पूजन करवाया। पश्चात गणेश पूजन कर 21 दीपकों से आरती की गई। 108 दीपक की महाआरती कर पुष्पांजलि अर्पित की।

यहां मां नर्मदा की आरती

मां नर्मदा की आरती अमरकंटक से शुरू की जाती है। मुख्य रूप से अमरकंटक, जबलपुर के ग्वारीघाट, आंवली घाट, होशंगाबाद के सेठानी घाट, ओंकारेश्वर के खेड़ी घाट, महेश्वर, खलघाट, गुजरात के भरुच में नर्मदा आरती के बाद मांडू के रेवा कुंड में भी नर्मदा आरती शुरू हो चुकी है।

मांडू के रेवा कुंड का इतिहास

मां नर्मदा के महत्व के बारे में नर्मदा महापुराण में मांडू का वर्णन दिया गया है कि यहां मार्कंडेय ऋषि ने तपस्या कर मां रेवा को प्रसन्न् कि या था। मां रेवा ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। मार्कंडेय ऋषि ने मां रेवा की अखंड परिक्रमा की है और मार्कंडेय ऋषि की कोई भी कालगणना अब तक नहीं की गई। रेवा कुंड का महत्व नर्मदा परिक्रमा में भी आता है। जब तक रेवा कुंड को परिक्रमा में नहीं लिया जाता, परिक्रमा अधूरी मानी जाती है। इसीलिए परिक्रमावासी मां रेवा की परिक्रमा करने के दौरान मांडू रेवा कुंड के दर्शन करने के लिए भी आते हैं। मार्कंडेय ऋषि द्वारा मांडू का नाम मंडप दुर्ग रखा गया था, जो कि प्राचीन नाम है।

Manmohan Pawar (Sampadak) Khabr News send kare WhatsApp no.- 9753903839